आत्मलीनता से विकारों पर विजय प्राप्त करना ही उत्तम तप
आत्मलीनता से विकारों पर विजय प्राप्त करना ही उत्तम तप
आत्मलीनता से विकारों पर विजय प्राप्त करना ही उत्तम तप

कोरबा : सभी रागादि भाव मोह, मान ,माया, लोभ, क्रोध को त्याग पूर्वक आत्म स्वरूप में अपने में लीन होना अर्थात आत्मलीनता से विकारों पर विजय प्राप्त करना ही उत्तम तप है। यहां तप के साथ लगा उत्तम शब्द, सम्यक दर्शन की सत्ता का सूचक है। उक्त विचार बुधवारी बाजार स्थित दिगंबर जैन मंदिर में पर्यूषण पर्व पर जयपुर से पधारे पंडित रोहित शास्त्री ने व्यक्त किया। उन्होंने हा कि नास्ति से इच्छाओं का अभाव और अस्ति से आत्म स्वरूप में लीनता ही तप है। सम्यक दर्शन के बिना किया गया तप निरर्थक है। यदि कोई जीव सम्यकत्व के बिना करोड़ों वर्षों तक उग्रतप भी करें, तो भी वह ज्ञान लाभ प्राप्त नहीं कर सकता है। देह और आत्मा का भेद नहीं जानने वाला अज्ञानी, यदि घोर तपश्चरण भी करें। तब भी वह मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सकता। जो अविनाशी आत्मा को शरीर से भिन्न नहीं जानता, वह घोर तपश्चरण करके मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकता ।जगत में ऐसा कोई पदार्थ नहीं जो निर्दोष तप से पुरुष को प्राप्त न हो सके। अर्थात तप से सर्व उत्तम पदार्थ की प्राप्ति होती है। संसार में जो भी वस्तु दिखाई देती है। वह वस्तु कहीं-ना-कहीं, किसी-न-किसी प्रकार के तप के बगैर निर्माण नहीं हुई है। सुबह सात बजे से श्री जी का अभिषेक, शांतिधारा प्रमोद जैन ने करते हुए नित्य नियम पूजन किया। प्रवचन कार्यक्रम में काफी संख्या में पुरुष व महिलाएं एवं बच्चे उपस्थित हुए।




